महत्वपूर्ण
विषयों पर अपनी कथनी और करनी के अंतर का ध्यान रखना चाहिए | क्योंकि कथनी
और करनी की प्रतिकूलता सदा ही खटकती है, किन्तु विशेषतया जब ऊँचे आदर्शों
की बात कही जाए और स्वयं उसका पालन न किया जाए तो लोग पाखंडी और अप्रामाणिक
ठहराते हैं |
उपयुक्त
यही है कि किसी को आदर्शवादिता के पक्ष में जोर देना हो तो साथ ही अपनी ओर
भी नजर डाल ली जाए कि यह हम स्वयं करते हैं या नहीं |
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
No comments:
Post a Comment