Good World

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Tuesday, March 20, 2012

कला लोकरंजन ही नहीं, भावनाओं का परिष्कार भी करे

भावनाओं के विकास और परिष्कार में कला का अति महत्त्वपूर्ण उपयोग है । संगीत, गायन, वाद्य, अभिनय, नृत्य, चित्र, साहित्य आदि कला पक्ष भावनाओं को उभारने में बहुत सहायक होते हैं । इन दिनों इस पक्ष का दुरुपयोग भी बहुत हुआ है । कामुकता भडक़ाने और लम्पटता को प्रोत्साहित करने में आज के कलाकार, कलाप्रेमी और संचालक बुरी तरह जुटे हुए हैं । फलस्वरूप जन-मानस में आदर्शवादी उमंगें उठना बंद हो गई हैं और लोगों के मन मॉंसल रूप-विन्यास-श्रृंगार, यौन आकर्षण की अधोगामी चेतनाओं को अपनी आकांक्षा का केन्द्रं बनाकर शारीरिक और मानसिक स्तर पर दिनों-दिन अधिक पतनोन्मुख होते  चले जा रहे हैं । कला का यह प्रत्यक्ष दुरूपयोग ही है । इसे सरस्वती माता को वैश्या के स्तर पर ला खड़ा करने जैसी दुष्टता ही कहा जायेगा । 


कला की शक्ति महान है, वह मानवीय अन्त:करण को भाव-विभोर कर सकने और उसमें प्रस्तुत उच्च आस्थाओं एवं मान्यताओं को ऊर्ध्वनगामी बना सकने में समर्थ हैं । प्राचीनकाल में कला का उपयोग लोक-मानस में उत्कृष्टता का संचार करने वाली कोमल भावनाओं को तरंगित करने के लिए ही किया जाता था । कला भक्ति-रस के इर्द-गिर्द धूमती थी । आत्म-विज्ञान वेत्ता मनीषियों ने इसी प्रयोजन के लिए भक्ति रस का विशाल कलेवर खड़ा किया और उसके साथ कला के समस्त अंग-प्रत्यंगों को जोड़ा । मूर्तिकला, चित्रकला, कीर्तन, प्रभुस्तवन, वंदना, नृत्य, कथा, साहित्य आदि प्राचीनकाल के सारे कला प्रयास भक्तिरस का अभिवर्द्धन करने के लिए नियोजित थे । इससे अन्त:करण गुदगुदाने की भावनात्मक अभिव्यंजना का आनन्द भी मिलता था और आस्थाएँ एवं मान्यताएँ ही ऊर्ध्वहगामी बनती थीं । वास्तव में इस प्रकार के सोद्देश्य कला प्रयासों को ही सार्थक कहा जा सकता है ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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