कहते
हैं कि निर्जीव चीजें एक और एक दो होती हैं किन्तु जीवित मनुष्य यदि
सच्चेपन से एक दूसरे को प्रेम करें और एकता की सुदृढ़ भावना में संबद्ध हों
तो वे एक और एक मिलकर ग्यारह बन जाते हैं । उनकी शक्ति का परिणाम अनेक
गुना अधिक बन जाता है । हमें इस प्रक्रिया को अपनाना ही होगा इसके बिना और
कोई मार्ग नहीं । सज्जनों का संगठन हुए बिना दुर्जनता का पलायन और किसी
उपाय से नहीं हो सकता ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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