सरकार
अपराधियों को दण्ड देकर आर्थिक प्रगति के थोड़े साधन जुटा सकती है पर
व्यक्तिगत मूढ़ता एवं दृष्टता को, सामाजिक भ्रष्टता एवं अस्त-व्यस्तता को
मिटाना उसके बलबूते की बात नहीं । अधिनायकवाद की बात दूसरी है । प्रजातंत्र
में यह बात नहीं । प्रजातंत्र में व्यक्ति अथवा समाज-सुधार का कार्य
लोकसेवियों पर निर्भर रहता है । उन्हीं की सत्ता, व्यक्ति या समाज का स्तर
ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है । प्राचीनकाल में देश का गौरव उच्च
शिखर पर पहुँचाये रखने का सारा श्रेय यहाँ के लोक-सेवियों को है । वे अपना
सारा समय दो कार्यों में खर्च करते थे । प्रथम - अपना व्यक्तित्व उच्चकोटि
का विनिर्मित करना, ताकि जनता पर उसका उचित प्रभाव पड़ सके । द्वितीय -
निरन्तर अथक परिश्रम तथा अनवरत उत्साह के साथ जन-मानस में उत्कृष्टता भरने
के लिए संलग्न रहना । साधु-ब्राह्मण और वानप्रस्थों की यही परम्परा एवं
कर्म पद्धति थी । उनकी संख्या जितनी बढ़ती थी उसी अनुपात से राष्ट्रीय जीवन
की हर दिशा में समृद्धि का अभिवर्द्धन होता चलता था । यही रहस्य था अपने
गौरवमय इतिहास का । दुर्भाग्य ही कहना चाहिए, कि वे तीनों ही संस्थाएँ आज
नष्ट हो गई । ब्राह्मण, साधु और वानप्रस्थ तीनों ही दिखाई नहीं पड़ते ।
उनकी तस्वीरें और प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में घूमती- फिरती नजर आती हैं पर
उनका लक्ष्य, आदर्श और कर्त्तव्य सर्वथा विपरित हो गया, ऐसी दशा में उनकी
उपयोगिता भी नष्ट हो गई ।
दुर्भाग्य
का रोना-रोने से काम न चलेगा । अभाव की पूर्ति दूसरी तरह करनी होगी । हम
गृहस्थ लोग ही थोड़ा थोड़ा समय निकाल कर लोक-मंगल की सत्प्रवृत्तियों का
अभिवर्द्धन करना अपना धर्म कर्त्तव्य समझें और उसके लिए निरन्तर कुछ न कुछ
योगदान देने के लिए तत्परता प्रकट करने लगें तो उस आवश्यकता की पूर्ति हो
सकती है, जिस पर प्रगति का सारा आधार अवलम्बित है । आवश्यकता ऐसे लोगों की
है, जिनके अन्त:करण में देशभक्ति, समाज-सेवा एवं लोक-मंगल के लिए कुछ करने
की उमंग भरी भावनाएँ लहरा रही हों । ऐसे ही नर-रत्न अपना जीवन धन्य करते
हैं, अपने समय की महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करते हैं । देशभक्त
नवनिर्माण के कार्य में जुट जाए
सरकार
अपराधियों को दण्ड देकर आर्थिक प्रगति के थोड़े साधन जुटा सकती है पर
व्यक्तिगत मूढ़ता एवं दृष्टता को, सामाजिक भ्रष्टता एवं अस्त-व्यस्तता को
मिटाना उसके बलबूते की बात नहीं । अधिनायकवाद की बात दूसरी है । प्रजातंत्र
में यह बात नहीं । प्रजातंत्र में व्यक्ति अथवा समाज-सुधार का कार्य
लोकसेवियों पर निर्भर रहता है । उन्हीं की सत्ता, व्यक्ति या समाज का स्तर
ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है । प्राचीनकाल में देश का गौरव उच्च
शिखर पर पहुँचाये रखने का सारा श्रेय यहाँ के लोक-सेवियों को है । वे अपना
सारा समय दो कार्यों में खर्च करते थे । प्रथम - अपना व्यक्तित्व उच्चकोटि
का विनिर्मित करना, ताकि जनता पर उसका उचित प्रभाव पड़ सके । द्वितीय -
निरन्तर अथक परिश्रम तथा अनवरत उत्साह के साथ जन-मानस में उत्कृष्टता भरने
के लिए संलग्न रहना । साधु-ब्राह्मण और वानप्रस्थों की यही परम्परा एवं
कर्म पद्धति थी । उनकी संख्या जितनी बढ़ती थी उसी अनुपात से राष्ट्रीय जीवन
की हर दिशा में समृद्धि का अभिवर्द्धन होता चलता था । यही रहस्य था अपने
गौरवमय इतिहास का । दुर्भाग्य ही कहना चाहिए, कि वे तीनों ही संस्थाएँ आज
नष्ट हो गई । ब्राह्मण, साधु और वानप्रस्थ तीनों ही दिखाई नहीं पड़ते ।
उनकी तस्वीरें और प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में घूमती- फिरती नजर आती हैं पर
उनका लक्ष्य, आदर्श और कर्त्तव्य सर्वथा विपरित हो गया, ऐसी दशा में उनकी
उपयोगिता भी नष्ट हो गई ।
दुर्भाग्य
का रोना-रोने से काम न चलेगा । अभाव की पूर्ति दूसरी तरह करनी होगी । हम
गृहस्थ लोग ही थोड़ा थोड़ा समय निकाल कर लोक-मंगल की सत्प्रवृत्तियों का
अभिवर्द्धन करना अपना धर्म कर्त्तव्य समझें और उसके लिए निरन्तर कुछ न कुछ
योगदान देने के लिए तत्परता प्रकट करने लगें तो उस आवश्यकता की पूर्ति हो
सकती है, जिस पर प्रगति का सारा आधार अवलम्बित है । आवश्यकता ऐसे लोगों की
है, जिनके अन्त:करण में देशभक्ति, समाज-सेवा एवं लोक-मंगल के लिए कुछ करने
की उमंग भरी भावनाएँ लहरा रही हों । ऐसे ही नर-रत्न अपना जीवन धन्य करते
हैं, अपने समय की महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करते हैं ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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