दिनभर
लोहा पीटने वाले लुहार की अपेक्षा अखाड़े में दो घण्टे कसरत करने वाला
पहलवान अधिक परिपुष्ट पाया जाता है । इसका कारण व्यायाम के साथ जुड़ी हुई
उत्साहवर्द्धक भावना है । कसरत करते समय यह मान्यता रहती है कि हम
स्वास्थ्य साधना कर रहे हैं और इस आस्था का मनोवैज्ञानिक असर ऐसा चमत्कारी
होता है कि देह ही परिपुष्ट नहीं होती, मन की हिम्मत तथा सशक्तता भी बहुत
बढ़ जाती है ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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