जिस
बुद्धिवाद के सहारे आस्था से अनास्था तक पहुँचा गया है, उसी सीढ़ी से उलटे
पैर रखते हुए नीचे उतरना होगा । इन परिस्थितियों में काँटे से काँटा
निकालने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं । बुद्धि की बुद्धि से ही मुठभेड़
कराई जाएगी । तर्क को तर्क से ही निरस्त किया जाएगा । प्रमाण, उदाहरण मात्र
अनाचार की सफलता के पक्ष में ही साक्षी नहीं देते, उनसे बढ़े आधार ऐसे
प्रस्तुत किये जा सकते हैं जो आदर्शों की गरिमा, आत्मिक शान्ति से भी बढ़कर
भौतिक प्रगति में योगदान करने की बात सिद्ध कर सकें । सत्य को तथ्य और
श्रेयस्कर सिद्ध करने पर किसी का आग्रह हो तो उसे उस रूप में प्रमाणित करने
वाली मनीषा ने चुनौती स्वीकार करने का निश्चय कर लिया है ।
धर्म
तत्त्व के शाश्वत सिद्धांतों को बुद्धिवाद की कसौटी पर कसे जाने के
उपरान्त मान्यता मिले, यह लगता तो बड़ा अटपटा है, पर बालहठ के सामने कोई
क्या करे । मचले बच्चे को बहलाने के लिए बाबा को यदि घोड़ा बनना पड़े तो
उसे
प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया जाता । यदि विज्ञान और बुद्धिवाद ने तर्क,
तथ्य, प्रमाण, उदाहरण के आधार पर ही किसी प्रतिपादन को स्वीकारने की बात
ठानी है तो उसमें शैली बदलने भर की कठिनाई पड़ेगी । नये आधार ढूँढ़ने का
झंझट तो है, पर बात असम्भव नहीं । एक भाषा बोलने वाले को यदि दूसरी बोलने
और सीखने के लिए विवश किया जाय तो यह झंझट भरा काम भी किसी प्रकार पूरा
किया ही जायेगा । इसमें असम्भव जैसा तो कुछ है ही नहीं ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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