आज
झूठ बोलने, मनोभावों को छिपाने और पेट में कुछ रखकर मुंह से कुछ कहने की
प्रथा खूब प्रचलित है। कोई व्यक्ति मुख से धर्मचर्चा करते हैं, पर उनके पेट
में पाप और स्वार्थ बरतता है। यह पेट में बरतने वाली स्थिति ही मुख्य है।
उसी के अनुसार जीवन की गति संचालित होती है। एक मनुष्य के मन में विश्वास
जमा होता है कि 'पैसे की अधिकता ही जीवन की सफलता है।' वह धन जमा करने के
लिए दिन-रात जुटा रहता है। जिसके हृदय में यह धारणा है कि ‘इंद्रिय भोगों
का सुख ही प्रधान है’, वह भोगों के लिए बाप-दादों की जायदाद फूँक देता है।
जिसका विश्वास है कि ‘ईश्वरप्राप्ति सर्वोत्तम लाभ है,’ वह और भोगों को
तिलांजलि देकर संत का सा जीवन बिताता है। जिसे देशभक्ति की उत्कृष्टता पर
विश्वास है, वह अपने प्राणों की भी बलि देश के लिए देते हुए प्रसन्नता
अनुभव करता है।
जिसके हृदय
में जो विश्वास जमा बैठा है, वह उसी के अनुसार सोचता है, कल्पना करता है
और इस कार्य के लिए जो कठिनाईयाँ आ पड़ें उन्हें भी सहन करता है। दिखावटी
बातों से, बकवास से, बाह्य विचारों से नहीं, वरन भीतरी विश्वास-बीजों से
जीवन दिशा का निर्माण होता है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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