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Friday, August 2, 2013

चरित्र की महत्ता

चरित्र की महत्ता पैसे से कहीं बढ़कर है। जिसने धन के लोभ में चरित्र खो दिया है, अथवा चरित्र खोकर धन कमाया है उसने मानो पाप ही कमाया है। चरित्रहीन व्यक्ति का संसार में कहीं भी आदर नहीं होता फिर उसका बैंक बैलेंस कितना ही लंबा चौड़ा क्यों न हो, इसके विपरीत चरित्रवान व्यक्ति निर्धनता की दशा में भी सब जगह सम्मान की दृष्टि से ही देखा जाता है।

यह चरित्र एवं सदाचरण का ही प्रभाव होता था कि पूर्व काल में किसी ऋषि अथवा मुनि के आ जाने पर बड़े-बड़े चक्रवती सम्राट उनके आदर में सिंहासन छोड़कर खड़े हो जाते थे। पूर्व काल ही क्यों, आज भी तो कोई विश्वस्त महात्मा अथवा आचरणवान व्यक्ति आ जाता है तो लोग उनके प्रति अहेतुक आदरभाव प्रदर्शित करने लगते हैं। कहाँ दयनीय वेशभूषा में धन-वैभव से रहित महात्मा गाँधी और कहाँ संसार का सबसे शक्तिशाली सम्राट पंचम जार्ज, किंतु महात्मा गांधी के उज्ज्वल चरित्र एवं सत्याचरण का ही चमत्कार था कि उक्त सम्राट को अपनी राज परम्परा की उपेक्षा करके उनसे समानता के स्तर पर आकर और खड़े होकर हाथ मिलाना पड़ा। यह शक्ति एवं वैभव पर चरित्र की विजय थी। अनेक लोग इस घटना का अवमूल्यन करने के लिए कह सकते हैं कि गाँधीजी की उस मान्यता के पीछे भारत के विशाल जनमत की श्रद्धा का बल था। किंतु जनमत की श्रद्धा जीतने के पीछे किसका बल था? निश्चय ही वह बल महात्मा के चरित्र एवं उज्ज्वल आचरण का था, जिसका संसार के सारे धन-वैभव की अचाहना करके, उन्होंने प्रयत्नपूर्वक विकास किया था। जिस विवेक बल पर गाँधीजी भारत का लोक नायकत्व प्राप्त कर सके थे, यदि वे चाहते तो उसी विवेक के बल पर असंख्यकपति बन सकते थे, जिस प्रकार लोग बने और बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। किंतु तब उनकी यह चरित्र रहित धनाढ्यता उनके लिए उस विशाल सम्मान का संपादन न कर सकती थी जो उन्हें मिला और संसार ने उन्हें दिया।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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