सफलता का मूलभूत आधार उत्कट इच्छा, तत्पर सक्रियता और क्रियाशीलता ही है। इसके बिना कोई भी व्यक्ति ऊँचा नहीं उठ सकता है और कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्त कर पाता है। तत्परता, तन्मयता, सक्रियता और मनोयोग के मूल में भी उत्कट आकांक्षा ही उत्प्रेरक काम करती है। यद्यपि सुख-दुःख भली-बुरी परिस्थितियाँ और उत्थान-पतन का मुख्य कारण मनुष्य का कर्म समझा जाता है। लेकिन कर्म रूप वृक्ष तो भी विचार और इच्छा रूपी बीज से ही उत्पन्न होता है, इच्छा से प्रेरणा की और प्रेरणा से कर्म की उत्पत्ति होती है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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