चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और संपदा है। संसार की अनंत संपदाओं के स्वामी होने पर भी यदि कोई चरित्रहीन है तो वह हर अर्थ में विपन्न ही माना जाएगा। निर्धन एवं साधनहीन होने पर चरित्रवान का मस्तक समाज में सदैव ऊँचा रहता है, उसकी आँखों में चमक और मुख पर तेज विराजमान रहता है। इसके विपरीत चरित्रहीन का व्यक्तित्व अपनी मलीनता की मखमल में भी नहीं छिप सकता।
संसार में उल्लेखनीय कार्य करने वालों में से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं रहा है जो पूरी तरह से चरित्रवान न हो। जन-नेतृत्व करने अथवा समाज की गति बदल देने की शक्ति केवल चरित्र से ही प्राप्त हो सकती है। मानव समाज का जो भी विकास आज तक हुआ है, या जो उन्नति और विकास आगे होगा उसके पीछे चरित्र धनी, सदाचारी लोगों का ही कर्त्तव्य रहा है और आगे भी रहेगा।
संसार में उल्लेखनीय कार्य करने वालों में से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं रहा है जो पूरी तरह से चरित्रवान न हो। जन-नेतृत्व करने अथवा समाज की गति बदल देने की शक्ति केवल चरित्र से ही प्राप्त हो सकती है। मानव समाज का जो भी विकास आज तक हुआ है, या जो उन्नति और विकास आगे होगा उसके पीछे चरित्र धनी, सदाचारी लोगों का ही कर्त्तव्य रहा है और आगे भी रहेगा।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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